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चाहा है बड़ी शिद्दत से तो क्यों न पाऊं उसे

  • चाहा है बड़ी शिद्दत से तो क्यों न पाऊं उसे,
    मर जाऊं इससे पहले की भूल जाऊं उसे

    सच मैंने कभी भी ज़ाहिर नहीं किया,
    अब करता है दिल जाकर गले लगाऊं उसे |

    वो इक गजल जो तन्हाई में गुनगुनाता हूँ,
    कभी मिले मुझे महबूब तो फिर सुनाऊं उसे |

    कहते हैं की सेहरा में गुल नहीं खिलते,
    झांके वो मेरे दिल में कभी तो दिखाऊं उसे |

    गलती थी मेरी जो मोहब्बत समझने बैठा था,
    कुछ समझा ही नहीं खुद क्या समझाऊं उसे |

    दस्तक हुई है दिल पे बड़े दिनों की बाद,
    उलझन बड़ी है कैसे अन्दर बुलाऊं उसे|

    अलग मज़ा है इसका भी ए यार मोहब्बत में ,
    कभी तो रूठे मुझसे वो और मैं मनाऊं उसे,

    गुज़रते है कू-ए-यार से हम इस अरमान से,
    आये वो कभी खिड़की में मैं जब बुलाऊं उसे|

    तेरे अक्स की खुशबु मेरी रूह में “राजीव”
    बैठे वो कभी पास तो मैं ये बताऊँ उसे |

  • chaaha hai badi shiddat se to kyon na paaoon use.

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